विभिन्नताओं का देश,दुनिया का सबसे बड़ा लोकतान्त्रिक राष्ट्र, तीज और त्योहारों का मुल्क,विकासशील देशों में आगे और तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था वाला वतन, ये तमगे तो हाल-फिलहाल मिले हैं, इससे पहले सोने की चिड़िया का सुनहरा पंख लूट लिए जाने के बाद सालों तक हमें एक सपेरों का देश के रूप में जाना गया, जहाँ के लोग गरीब, कम पढे-लिखे,जंगली और नाचने-गाने वाले बंजारे जैसे हैं।
वो कहते रहे और हम सुनते रहे। इसका कारण भी था, क्योंकि जिन सभ्य और जरूरत से ज्यादा शिक्षित लोगों ने ये लिखने में कि ‘कर्म आपके शब्दों से ज्यादा कहते हैं,‘ 21वीं सदी लगा दी, हम इसे बिना पढ़े ही जंगलों में रहते सीख चुके थे।
धीरे-धीरे सही लेकिन हमने अपनी चाल में निरंतरता रखी। किस्से,कहानियों,तस्वीरों,किताबों, टेलिविजन और फिल्मों के जरिये दुनिया हमारे बारे में सुनने और जानने लगी। दुनिया के नक्शे में हम पर निशान लगाया जाने लगा। लाइब्ररी में हमारी किताबों को जगह दिये जाने लगे। सैटेलाइट टीवी चैनल पर कई नंबर हमारे कार्यक्रमों को भी मिलने लगे,सिनेमाघरों में हमारी फिल्में चलाये जाने लगी।
लोगों का नज़रिया बदलने लगा था लेकिन हमने हमारी फितरत नहीं छोड़ी और हम भला छोडते भी क्यों!
नई चीज़ें सीखने में हमें परहेज नहीं है। लेकिन जो हम हैं, जो हमारे मूल्य हैं ,जो हमारी संस्कृति है, जो हमारा रहन-सहन है, जो हमारे तौर-तारीके हैं, उन्हें तो हम बदलने से रहे, ना बीते कल में, ना आज में और न आने वाले वक़्त में।
हम तो जिद्दी हैं, बदले नहीं लेकिन जिन तमगों से हमें चिढ़ाने के लिए नवाज़ा गया था उन्हें वक़्त के साथ तारीफ में बदलते देखा। नाचने-गाने वाले एक गीत ने और दो गरीब, कम पढ़े-लिखे औरत-आदमी के हाथी प्रेम की एक छोटी सी जंगली कहानी ने आज अकादमी पुरुस्कार हासिल किया और पूरी दुनिया ने खड़े होकर ताली बजाई।